टेक जायंट्स पर एंटीट्रस्ट स्क्रूटनी, मार्केट डोमिनेंस पर रेगुलेटर्स का प्रेशर
बड़ी टेक कंपनीज पर रेगुलेटर्स का प्रेशर बढ़ रहा है, उनकी मार्केट डोमिनेंस को लेकर एंटीट्रस्ट इन्वेस्टिगेशन्स चल रही हैं। क्रिटिक्स का कहना है कि ये कंपनीज कॉम्पिटिशन और इनोवेशन को रोक रही हैं।
ग्लोबल रेगुलेटरी बॉडीज बड़ी टेक जायंट्स पर अपनी स्क्रूटनी बढ़ा रही हैं, नई एंटीट्रस्ट इन्वेस्टिगेशन्स लॉन्च कर रही हैं जो डिजिटल लैंडस्केप को रीशेप कर सकती हैं। ऑनलाइन एडवर्टाइजिंग और ई-कॉमर्स से लेकर सोशल मीडिया और क्लाउड कंप्यूटिंग तक, कुछ कंपनीज के पास जो इनॉर्मस मार्केट डोमिनेंस है, उस पर कंसर्न्स बढ़ रहे हैं। क्रिटिक्स का आरोप है कि ये फर्म्स एंटी-कॉम्पिटिटिव प्रैक्टिसेस में इन्वॉल्व हैं, जिससे छोटे इनोवेटर्स को दबाया जा रहा है और कंज्यूमर चॉइसेज लिमिटेड हो रही हैं।
हाल के वीक्स में, सर्च रिजल्ट्स में एलेज्ड सेल्फ-प्रेफरेंसिंग, एक्सक्लूसिव ऐप स्टोर पॉलिसीज, और इमर्जिंग कॉम्पिटिटर्स को एलिमिनेट करने वाले मर्जर जैसे स्पेसिफिक प्रैक्टिसेस को टारगेट करते हुए कई हाई-प्रोफाइल प्रोब्स की अनाउंसमेंट्स हुई हैं। यूरोपियन यूनियन, यूनाइटेड स्टेट्स और एशिया सहित दुनिया भर की गवर्नमेंट्स, इन टेक बीहेमोथ्स की पावर को कंट्रोल करने के लिए नए लेजिस्लेटिव फ्रेमवर्क्स पर रिसर्च कर रही हैं। इन इन्वेस्टिगेशन्स के आउटकम से बड़े फाइन्स, फोर्स्ड डाइवैस्टीचर्स, या इन कंपनीज के ऑपरेट करने के तरीके में फंडामेंटल चेंजेस हो सकते हैं।
टेक इंडस्ट्री, फेयर कॉम्पिटिशन की जरूरत को मानते हुए भी, अक्सर अपनी स्केल को एफिशिएंसी और इनोवेशन के बेनिफिट्स का हवाला देकर डिफेंड करती है जो बड़ी कंपनीज ला सकती हैं। हालांकि, पॉलिसीमेकर्स के बीच बढ़ती कंसेंसस यह है कि मौजूदा रेगुलेटरी एनवायरनमेंट डिजिटल मोनोपॉलीज द्वारा पेश की गई यूनिक चैलेंजेस को एड्रेस करने के लिए इनसफिशिएंट है। इन्वेस्टर्स इन डेवलपमेंट्स को क्लोजली वॉच कर रहे हैं, क्योंकि पोटेंशियल रेगुलेटरी एक्शन्स से इन फर्म्स के स्टॉक वैल्यूएशन्स और फ्यूचर ग्रोथ प्रॉस्पेक्ट्स पर सब्सटेंशियल इंपैक्ट पड़ सकता है।